बिना भैंस के दूध - दही - घी bina bhains ke dudh dahi ghee
बिना भैंस के दूध - दही - घी
एक गॉव में रहता था निर्धन किसान परिवार ,
पति - पत्नी मिल चला रहे थे किसी तरह घर - बार ,
दोनों मिलकर खूब परिश्रम खेतों में करते थे ,
फिर भी अच्छी तरह न उनके पेट कभी भरते थे ,
एक रोज की बात है दोनों बैठे थे आँगन में ,
पति अपनी पत्नी से बोला अति प्रसन्न हो मन में ,
" सुनो प्रिये ! इस बार फसल अपनी भी अच्छी होगी ,
खाएँगे भर पेट और घर में कुछ लक्ष्मी होगी। "
यह सुन कर के पत्नी भी हो गई फूलकर कुप्पा ,
बोली - " मेरे होने वाले बच्चे के ओ बाप्पा ,
घर में लक्ष्मी आएगी , नथुनी गढ़वाऊंगी ,
बन - थान करके, शहर - सलीमा देखन जाऊँगी। "
" नहीं - नहीं ,यह फ़िज़ूल खर्ची कभी न होने दूंगा ,
बचे हुए पैसों से अच्छी भैंस एक मैं लूंगा। "
पत्नी बोली खूब चहककर ," बात रही यह पक्की ,
दूध - दही - घी घर में होगा , होगी खूब तरक्की।
कुछ बेचूंगी दूध - दही , कुछ घर में खाऊँगी ,
थोड़ा दूध - दही - घी अपने मैके भिजवाऊँगी। "
इतना सुनकर उछाल पड़ा पति आग बबूला होकर ,
लगा पीटने पत्नी को , मोटा- सा डंडा लेकर।
पीट - पीटकर कहता था - "तू घर को लुटवाएगी ?
मेरे घर का दूध - दही - घी , मैके भिजवाएगी ?
यदि इस घर का दूध - दही - घी मैके भिजवाएगी ?
टाँगे दूंगा तोड़ , मोटाई सारी झड़ जाएगी। "
यह सब देख पडोसी अपना डंडा लेकर आया ,
पति के कूबड़ पर जोरों से , चार बार चटकाया ,
डंडे खाकर चार रह गया, पति अब हक्का - बक्का ,
बोला - " हमको मार रहे क्यों अरे पडोसी कक्का ?"
कहा पडोसी ने - "देखो चलकर तुम साथ हमारे ,
आज तुम्हारी भैंस हमारे , खेत चर गयी सारे। "
पति बोला - "हे कक्का , इतना झूठ न बोलो ऐसे ,
भैंस नहीं पाली जब मैंने , खेत चर गई कैसे ?"
कहा पडोसी ने तपाक से - "सुन बे ओ घनचक्कर ,
भैंस नहीं तो मार- पीट का है यह कैसा चक्कर ?
बिना भैंस के दूध - दही की धार बहेगी कैसे ?
दूध - दही जब नहीं तो ये मैके भिजवाएगी कैसे ?"
सुनकर सारी बात समझ में जब किसान के आया,
हँसकर अपनी पत्नी को तब उसने गले लगाया।







